'द ग्रेट गेम': जब काराकोरम बना था जासूसों का अड्डा, भारतीय हिस्से पर क़ब्ज़े के लिए रूस और ब्रिटेन का संघर्ष

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भारतीय फ़ौजी इंटेलिजेंस के पूर्व चीफ़ जनरल (रिटायर्ड) अमरजीत बेदी ने लद्दाख़ के क्षेत्र में भारत और चीन के फ़ौजी तनाव की पृष्ठभूमि में हाल ही में कहा था कि भारत को अपनी ख़ुफ़िया एजेंसियों की भूमिका की समीक्षा करनी चाहिए और चीन के साथ तनाव ख़त्म होने के बाद उन्हें ठीक किया जाना चाहिए.

याद रहे कि जिन पहाड़ी श्रृंखलाओ में आज चीन और भारत आमने-सामने हैं वहां पहली बार बड़ी वैश्विक ताक़तें आमने सामने नहीं आई हैं. पहले भी ये क्षेत्र रूस, चीन और ब्रिटिश भारत के बीच एक बड़ा संघर्ष देख चुका है.

आज, मानवीय साहस, क्षमता और बुद्धिमत्ता के साथ-साथ विज्ञान और आधुनिक उपकरणों की पहुंच भी जासूसी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, लेकिन वैज्ञानिक खोजों के युग से पहले, उस समय स्थिति बहुत अलग थी.

इसकी एक झलक देखने के लिए हिमालय, काराकोरम, हिन्दुकुश और पामेर की ही पहाड़ी श्रृंखलाओं में चलते हैं लेकिन आज से दो सौ साल पहले.

19वीं सदी के शुरू में जानवरों का एक अँग्रेज़ डॉक्टर तिब्बत पहुंचा. कहा जाता है कि डॉक्टर विलियम मूर क्राफ्ट से पहले इस क्षेत्र से सन 1715 में दो यूरोपीय पादरी गुज़रे थे.

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